Friday, September 15, 2017

भरत का मित्रों के समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दुःस्वप्न का वर्णन करना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

एकोन सप्ततितमः सर्गः

भरत की चिंता, मित्रों द्वारा उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास तथा उनके पूछने पर भरत का मित्रों के समक्ष अपने देखे हुए भयंकर दुःस्वप्न का वर्णन करना

जिस रात्रि प्रवेश किया था, आकर दूतों ने उस नगरी में
इक अप्रिय स्वप्न देखा था, पूर्व रात्रि को कुमार भरत ने

प्रायः भोर होने को थीस्वप्न देख जब हुए थे चिंतित
दुखी उन्हें जान मित्रों ने, एक सभा तब की आयोजित

क्लेश मानसिक दूर हो सके, उन्हें सुनाया वीणा वादन
हास्य रसों की थी प्रधानता, नृत्य, नाटिका का भी मंचन 

किन्तु भरत प्रसन्न ना हुए, प्रियवादी उन मित्रों के संग
देख उन्हें तब व्यथित निरंतर, एक मित्र ने पूछा कारण

कहा भरत ने, तुम्हें बताता, किस कारण यह दैन्य हुआ था 
स्वप्न में देखा पिता को अपने, खुले केश व मुख मलिन था

पर्वत की चोटी से गिरकर, गोबर के खड्ड में पड़े थे
तिल, भात का भक्षण करके, हँसते हुए से तेल पी रहे

सागर को सूखते देखा, चाँद को गिरते हुए धरा पर
उपद्रव से ग्रस्त थी वसुधा, अंधकार छाया सभी ओर

दांत टूट कर हुआ था टुकड़े, महाराज के गजराज का
प्रज्ज्वलित अग्नि सहसा बुझ गयी, पर्वतों से निकलता धुआं

फटी है धरती, वृक्ष सूख गये, पर्वत कई ढह गये हैं
काले चौके पर बैठे राजा, स्त्रियाँ प्रहार करती हैं

रक्तिम फूलों की माला पहने, चन्दन भी लाल लगाए
गधे जुते रथ पर बैठे, दक्षिण दिशा की ओर बढ़ रहे

लाल वस्त्र पहने इक औरत, राक्षसी प्रतीत होती थी
महाराज को हँसती हुई वह, खींचकर लिए जाती थी

यह भंयकर स्वप्न देखा हैइसका फल यही तो होगा
 पिता, राम या लक्ष्मण में से, कोई प्राप्त मृत्यु को होगा

गधे जुते रथपर चढ़कर जो, नर स्वप्न में नजर है आता
उसकी चिता का धुआं शीघ्र ही, वास्तव में दिखाई देता 

इस कारण ही दुखी हो रहा, गला शुष्क, मन मेरा व्याकुल
भय का कारण नहीं देखता, फिर भी भय से मैं हूँ आकुल 

स्वर बदला, कांति फीकी है, स्वयं से ही नफरत होती है
क्या है इसका कारण लेकिन, मेधा समझ नहीं पाती है

पहले कभी नहीं सोचा था, ऐसे दु:स्वप्नों को देखा
चिंतित हूँ मैं यही सोचकर, दूर नहीं भय को कर पाता

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में उनह्त्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ.


Monday, September 11, 2017

वसिष्ठजी की आज्ञा से पांच दूतों का अयोध्या से केकयदेश के राजगृह नगर में जाना



श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्


अष्टषष्टितम: सर्ग:

वसिष्ठजी की आज्ञा से पांच दूतों का अयोध्या से केकयदेश के राजगृह नगर में जाना 

मुनि वसिष्ठ ने दिया यह उत्तर, सुने वचन जब मंत्रीगण के
राज्य दिया भरत को नृप ने, भाई सहित है घर मामा के

तीव्रगामी अश्वों पर चढ़कर, दूत उन्हें बुलाने जाएँ
इसके सिवा कुछ और विचार, हम मिलकर भी क्या कर सकते  

सभी ने मानी बात मुनि की, दूतों को ये संदेश दिए
सिद्धार्थ, विजय, अनंत, अशोक ! जो हम कहते सुनो ध्यान से

अश्वों पर होकर सवार तुम, तेज गति से जो चलते हों
राजगृह नगर को जाओ, भाव शोक का प्रकट नहीं हो

सबका कुशल-मंगल बताकर, राजकुमार से यह कहना
शीघ्र चलें अयोध्या वापस, आवश्यक अति कार्य आया

नहीं बताना यहाँ का हाल, राम का वनवास न कहना
पिता की मृत्यु, दुःख परिस्थति, इसकी चर्चा भी न करना

कैकय राज व भरत के हेतु, वस्त्र रेशमी, आभूषण लो
यात्रा की तैयारी करके, गये दूत शीघ्र राजगृह को

अपर ताल नामक पर्वत तक, प्रलम्ब गिरी के उत्तर में
नदी मालिनी जो बहती है, उसके तट पर होते गये 

हस्तिनापुर में पार की गंगापश्चिम के पांचाल देश गये
कुरुजांगल प्रदेश से होते, आगे बढ़ते वे सुंदर पथ से

कुसुमों से सुशोभित सर्वर, निर्मल जल वाली नदियों को
थी पक्षियों से सेवित जो, लाँघ गये नदी शरदंडा को

शरदंडा के पश्चिम तट पर, दिव्य वृक्ष पर देव का वास
जो याचना वहाँ की जाती, सफल होती थी वह आयास

सत्योपयाचन नाम वाले, परिक्रमा पावन वृक्ष की
दूतों ने की आदर से, कुलिंगा पुरी में प्रवेश किया 

तेजोभिभवन गाँव मिला फिर, जा पहुँचे अभिकाल गाँव में
इक्षुमती को पार कियासेवित जो नृप के पूर्वजों से

अंजलि भर जल पीकर ही, तप करने वाले ब्राह्मणों का
दर्शन कर पहुँचे दूत तब, बाह्लीक के पर्वत सुदामा

जिस पर्वत के शिखर पर स्थित, चरण चिह्न थे अंकित विष्णु के
 गये व्यास नदी के तट पर, दर्शन किये शाल्मली वृक्ष के 

आगे बढने पर नदियों को, बावड़ियों, पोखर, तालाबों
भांति-भांति के जीव-जन्तुओं, देख कर बढ़ते आगे को

स्वामी की इच्छा का पालन, शीघ्र करें थी यही कामना
थक गये थे अश्व भी उनके, मार्ग दीर्घ उपद्रव रहित था

तय करके वे सारे दूत, गिरिव्रज नगर में जा पहुँचे थे
प्रिय करने अपने स्वामी का, प्रजावर्ग की रक्षा करने

रजा दशरथ के राज्य को, भरतजी से स्वीकार कराने
सादर तत्पर हुए दूत वे, रात्रि में ही लक्ष्य पर पहुँचे


 इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में अरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ.

Friday, September 8, 2017

मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा मंत्रियों का वसिष्ठ जी से किसी को राजा के बनाने के लिए अनुरोध

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

सप्तषष्टितम: सर्गः
मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा मंत्रियों का राजा के बिना होनेवाली देश की दुरवस्था का वर्णन करके वसिष्ठ जी से किसी को राजा के बनाने के लिए अनुरोध 

राजा नहीं हो जिस राज्य में, वीरों का अभ्यास न होता
प्रत्यंचा व करतल का भी, शब्द सुनाई कहीं न देता

जा दूर देश करें व्यापार, वणिकों को सम्भव न होता
संध्या काल में  डेरा डाले, मुनि भी ऐसा नहीं विचरता

अप्राप्त की प्राप्ति न होती, प्राप्त वस्तु की रक्षा भी नहीं
शत्रु सामना नहीं कर पाए, राजा न हो तब सेना भी

शास्त्रों के ज्ञाता, विद्वान, वन-उपवन में विचरण न करते
देवों की पूजा के हित जन, पुष्प, मिठाई आदि न देते

चन्दन, अगरु लेप लगाये, राजकुमार न शोभा पाते
जहाँ कोई राजा न होता, ज्ञानी भी सम्मान न पाते

जल बिन नदी, घास बिन जंगल, ग्वालों बिना न शोभें गायें
उसी प्रकार बिना राजा के, कोई राज्य न शोभा पाए

ध्वजा दिखा देता ज्यों रथ को, धूम्र दिखाता है अग्नि को
राजा ही प्रकाशित करता है, राजकाज के अधिकार को

राजा के न रहने पर ही, वस्तुओं पर अधिकार न रहता
मछली ज्यों मछली को खाती, इक-दूजे को लूटे जनता

वेदशास्त्र, वर्णाश्रमधर्म की, मर्यादा भंग करें जो
नास्तिक जो पहले दबे थे, हो निशंक प्रकट अब होंगे

दृष्टि सदा तन हित में लगती, राजा सत्य-धर्म का वाहक
कुलवानों का कुल है राजा, माता-पिता व हित संवाहक

यम, कुबेर, इंद्र, वरुण से भी, राजा देवों से बढ़ जाता
भले-बुरे का भेद बताये, वही न हो कुछ सूझ न आता

सागर ज्यों सीमा में रहता, कहा वसिष्ठ से तब मिल सबने
 बात आपकी सदा ही मानी, राजा के जीवन काल में

जंगल बने हुए इस देश पर, दृष्टिपात करें हे मुनिवर !
राजकुमार या योग्य व्यक्ति को, अभिषिक्त करें राजपद पर

इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में सरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ.


Thursday, September 7, 2017

मार्कण्डेय आदि मुनियों का राजा बिना होनेवाली देश की दुरवस्था का वर्णन करके किसी को राजा के बनाने के लिए अनुरोध

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

सप्तषष्टितम: सर्गः
मार्कण्डेय आदि मुनियों तथा मंत्रियों का राजा के बिना होनेवाली देश की दुरवस्था का वर्णन करके वसिष्ठ जी से किसी को राजा के बनाने के लिए अनुरोध 


अयोध्या वासियों  की रात, रोते और कलपते बीती 
अश्रुओं से कंठ पूरित थे, दुःख के कारण लंबी लगती 

राज्य का प्रबंध जो करते, प्रभात हुआ वे ब्राह्मण आये 
मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, कश्यप, गौतम भी आये 

महायशस्वी जाबालि, कात्यायन, राज पुरोहित वसिष्ठ 
राय सभी अपने देते थे, साथ बैठ मंत्रीगण वरिष्ठ 

पुत्रशोक से होकर पीड़ित, राजा ने निज देह त्याग दी 
अति शोक से रात्रि बीती यह, सौ वर्षों समान लगती थी 

श्री रामवर  के सहित लक्ष्मण, दोनों भाई वन में बसते 
भरत, शत्रुघ्न ननिहाल हैं, राजमहल में केकय देश के

इक्ष्वाकुवंशी सुत में से, राजा किसी को चुनना होगा  
 बिना राजा के इस राज्य का, वरना पूर्ण नाश ही होगा  

जहाँ कोई राजा न होता, मेघ वहाँ पर नहीं बरसते 
उस जनपद में कृषि न होती, बीज भी नहीं बिखेरे जाते 

पुत्र पिता के वश न रहते, स्त्रियाँ पति की बात नहीं माने 
धन भी अपना न रह जाता, भय रहता है सदा हृदयों में

राजा बिना निवासी कोई, बाग़-बगीचा नहीं लगाता 
धर्मशाला, मन्दिर बनते न, यज्ञों का आयोजन होता

महायज्ञ यदि हुए आरम्भ, ऋत्विजों को  दक्षिणा कम  मिलती 
उत्सव, मेले नहीं हो पाते, राष्ट्र हित में सभा न होती

व्यापारियों को लाभ न होता, विवादों का समाधान भी
कथावाचक कथा नहीं कहते, भय लगता यात्रा से भी 

स्वर्णिम आभूषण धारण कर, नहीं निकलती हैं कन्यायें  
नहीं सुरक्षित धनी, द्वार खोल, कृषक, वैश्य भी न सो पायें 

वनविहार हित नर-नारी भी, वाहन द्वारा नहीं निकलते 
राजा बिना किसी राज्य में, हाथी सड़क पर नहीं घूमते 

Wednesday, August 23, 2017

मंत्रियों का राजा के शव को तेल से भरे हुए कड़ाह में सुलाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

षट्षष्टितमः सर्गः

राजा के लिए कौसल्या का विलाप और कैकेयी की भर्त्सना, मंत्रियों का राजा के शव को तेल से भरे हुए कड़ाह में सुलाना, रानियों का विलाप, पूरी की श्रीहीनता और पुरवासियों का शोक

बुझी अग्नि, जलविहीन समुद्र, आभाहीन सूर्य की भांति
शोभाहीन देखा राजा को, कौसल्या हुईं अति दुखी

शोकाकुल हो अश्रु बहातीं, ले  गोद राजा का मस्तक
कैकेयी से वे तब बोलीं, राज्य भोग तू हो अकंटक

सफल हुई है तेरी इच्छा, त्याग पति को हो एकाग्र
राम गये वन, पति सिधारे, असहाय मैं प्राण दूँ त्याग

नारी धर्म को त्यागा जिसने, कैकेयी समान कौन स्त्री 
देवस्वरूप पति को त्याग, जीना चाहे कोई न दूजी

धन का लोभी विष दे देता, हत्या को नहीं माने दोष
कुब्जा के कहने में आकर, कुल का किया है इसने नाश

श्रीराम को भेजा वनवास, राजा से अनुचित करवाया
राजा जनक यह जब जानेंगे, अति दुःख उनको भी होगा

विधवा और अनाथ हुई मैं, नहीं ज्ञान राम को इसका 
जीते जी ही हुए दूर वे, दुःख पा रही पुत्री सीता

पतिसेवा का तप करती जो, दुःख पाने के योग्य नहीं है
उद्वगिन हो उठेगी सीता, वन में पीड़ा अनुभव करके 

रात्रि काल में पशुओं का जब, शब्द भयानक वन में होगा
श्रीराम की शरण ही लेगी, भयभीत होकर तभी सीता

वृद्ध पिता जो कन्याओं के, जनक पुत्री की चिंता करके
डूबे हुए अति शोक में, प्राणों का परित्याग करेंगे

मैं भी आज ही वरण करूँगी, पतिव्रता भांति मृत्यु का
 चिता की अग्नि में प्रवेश कर, कर आलिंगन पति देह का

पति देह को लगा हृदय से, करती जो दुःख से आर्त विलाप
दूर किया उन्हें स्त्रियों द्वारा, राज मंत्रियों ने तब आकर

तेल भरे कड़ाहे में तब, राजा की देह को रखवाया
शव रक्षा को कह वशिष्ठ ने, राज काज पर ध्यान लगाया

झरने से आँसू बहते थे, हाथ उठा कर वे रोती थीं
 राजा भी अब विदा हो गये, पुत्र शोक से हम व्याकुल थीं

श्रीराम से बिछुड़ गयी, कैसे रहेंगी कैकेयी संग 
जिसने सबको त्याग दिया है, हम पर आया भारी संकट

महाशोक से ग्रस्त हुईं वे, अश्रु बहाती चेष्टा करतीं
लुट गया आनंद था उनका, रोती थीं वे मोहित हुई सी

राजा दशरथ से हीन हुई, श्रीहीन अयोध्या लगती
तारों हीन रात्रि हो जैसे, पतिविहीन नारी की भांति

नगर निवासी सब आकुल थे, कुलवती महिलाएं रोती थीं
चौराहे, घर द्वार सूने थे, पुरी नहीं शोभा पाती थी

राजा दुःख से स्वर्ग सिधारे, रानियाँ भूमि पर लोटतीं
सूर्य अस्त हुए इस दुःख में, अंधकार ले रात्रि आ गयी

राजा का अंतिम संस्कार, पुत्र बिना नहीं सम्भव होगा
सभी सुहृदों की राय यही थी, शव उनका रक्षित रखा था

प्रभाहीन आकाश हुआ था, शोभाहीन रात्रि लगती थी
आँसू से अवरुद्ध कंठ ले, चौराहों पर भीड़ खड़ी थी

झुण्ड के झुण्ड मिल पुरुष, स्त्रियाँ, कैकेयी की निंदा करते
नहीं कोई भी सो पाता था, शोकाकुल थे सब हो रहे


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में छाछठवाँ सर्ग पूरा हुआ.

Saturday, August 5, 2017

वन्दीजनों का स्तुतिपाठ, राजा दशरथ को दिवंगत हुआ जान उनकी रानियों का करुण विलाप

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

पंचषष्टितमः सर्गः

वन्दीजनों का स्तुतिपाठ, राजा दशरथ को दिवंगत हुआ जान उनकी रानियों का करुण विलाप

रात बीतने पर अगले दिन, वन्दीजन जब हुए उपस्थित
उत्तम सूत, गायक व मागध, यशोगान करने को प्रस्तुत

उच्च स्वरों में देकर आशीषें, राजा की स्तुति करते थे
गुंजित हुआ शब्द उनका तब, भीतर जाकर राजमहल के

सूतगण मिल स्तुति करते थे, पाणिवादक भी कुछ आये थे
कर्मों का करके बखान तब, ताल गति से ताली बजाते

वृक्षों की डालों पर बैठे, पिंजरे में बंद पक्षी भी
जगे शब्द सुन लगे चहकने, गूँजा तब वीणा का स्वर भी

सदाचारी कुशल सेवक तब, प्रतिदिन की भांति आ पहुंचे
भृत्यजन भी स्नान के लिए, स्वर्ण घड़ों में नीर ले आये

पवित्र आचरण करती थीं जो, स्त्रियाँ व कन्यायें कुमारी
गौ, गंगाजल, दर्पण आदि भी, आभूषण, वस्त्र ले आयीं

राजाओं के मंगल हेतु, हर अभिहारिक वस्तु वहाँ थी
विधि अनुरूप, गुणों से युक्त, शुभ लक्षणों से सम्पन्न थी

सूर्योदय होने तक सेवक, प्रतिदिन भांति वहाँ आ गये
राजा जब बाहर न निकले, शंका से सबके मन भर गये

जो राजा के निकट रहती थीं, निकट गयीं तब वे स्त्रियाँ
युक्तिपूर्वक स्पर्श किया जब, जीवन का लक्षण न पाया


Friday, August 4, 2017

राजा दशरथ का आधी रात के समय अपने प्राणों को त्याग देना


श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

चतुःषष्टितमः सर्गः

राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनिकुमार के वध से दुखी हुए उनके माता-पिता के विलाप और उनके दिए हुए शाप का प्रसंग सुनाकर कौसल्या के समीप रोते-बिलखते हुए आधी रात के समय अपने प्राणों को त्याग देना  

स्वाध्याय और तप के बल से, प्राप्ति होती जिस ईश्वर की
परम आश्रयदाता जो है, प्राप्त करोगे उसी को तुम भी 

भूमिदाता, अग्निहोत्री, एकपत्नी व्रती, व दानी
गुरू सेवक, महाप्रस्थानी, गति मिले तुम्हें उनकी सी

तापस के कुल में जन्मा जो, नहीं दुर्गति उसकी होती
जिसने तुम्हें अकारण मारा, बुरी गति तो उसकी होगी

करने लगे विलाप, पत्नी संग, दी जलांजलि फिर पुत्र को
पुण्यकर्मों के प्रभाव से, जाने लगा कुमार स्वर्ग को

इंद्र सहित उस तापस ने तब, माता-पिता से चर्चा भी की
महान स्थान को प्राप्त हुआ हूँ, सेवा से आप दोनों की

शीघ्र मुझे आ मिलें आप भी, कहकर वह विमान में बैठा
पत्नी सहित मुनि ने मुझसे, हाथ जोड़कर वचन यह कहा

राजन ! मुझे मार डालो तुम, कष्ट नहीं होगा मरने से
एक पुत्र ही था हमारा, पुत्रहीन कर दिया तुम्हीं ने

राजन ! मुझे मार डालो तुम, कष्ट नहीं होगा मरने से
 एक ही थी संतान हमारी, पुत्रहीन कर दिया तुमने

की मेरे बालक की हत्या, अज्ञान वश ही निज बाण से 
दूँगा तुमको शाप भयंकर, दुखी होगे पुत्र वियोग से

हो क्षत्रिय तुम अनजाने में, वैश्य मुनि का वध कर डाला  
ब्रह्महत्या नहीं हुई है, फिर भी होगी दुखद अवस्था

फल प्राप्त जैसे करता है, दक्षिणा देने वाला दाता
हर ले प्राण भयानक ऐसी, शीघ्र मिलेगी तुम्हें अवस्था

इस प्रकार शापित कर मुझको, अति करुणाजनक विलाप किया
जलती हुई चिता में जाकर, दोनों ने तब प्रस्थान किया

बालस्वभाव के वश मैंने, शब्दवेधी बाण चलाया
खींचा बाण जब मुनिकुमार का, वध रूपी फिर पाप किया

पुत्र वियोग की चिंता मन में, पाप स्मरण वही हो आया
अपथ्य वस्तुओं के कारण ज्यों, रोग शरीर में आ जाता

उस पापकर्म का फल मिला है, अभिशाप सत्य हुआ मुनि का
नहीं देख पाता हूँ तुमको, प्राणों को विलीन करूंगा

मरणासन्न देख नहीं पाते, बन्धु जन को मृत्युकाल में
स्पर्श करें राम यदि मेरा, जी सकता हूँ उसी दशा में

जो बर्ताव किया राम से, कदापि नहीं योग्य था मेरे
किंतु राम ने किया है जो भी, योग्य सर्वथा है उनके

पुत्र दुराचारी हो तब भी, कोई भी त्याग नहीं करता
कौन पुत्र ऐसा जग में, मुझ जैसे पिता को नहीं कोसता

कौसल्ये ! देख नहीं पाता, स्मरण शक्ति भी लुप्त हो रही
ले जाने को हो उतावले, आ पहुंचे हैं यमदूत भी

दर्शन राम के नहीं मिल रहे, इससे बढ़ क्या दुःख हो सकता
जैसे धूप सुखाती जल को, इन प्राणों को शोक सुखाता

मानव नहीं देवता हैं वे, जो राम को पुनः देखेंगे
सुंदर कुंडल युक्त मनोहर, दर्शन उस मुख का करेंगे

कमल नयन, सुंदर भौहें हैं, स्वच्छ दांत, नासिका सुंदर
चन्द्रोपम मुख श्रीराम का, धन्य बनेंगे दर्शन पाकर

त्याग मूढ़ता सुख पाते ज्यों, उसी प्रकार सुखी होंगे वे
अवधि काटकर वनवास की, जब राम अयोध्या लौटेंगे

मोह छा रहा मन पर मेरे, हृदय विदीर्ण हुआ अब जाता
शब्द, स्पर्श, रस, गंध आदि का, भान भी सभी खोया जाता

तेल समाप्त होने पर जैसे, दीपक की प्रभा मिट जाती
नष्ट चेतना के होने से, इन्द्रियां  विनष्ट हुई जातीं

वेग नदी का काट गिराता, है जैसे अपने ही तट को
मेरा उत्पन्न किया शोक ही, अचेत किये जाता मुझको

हे रघुनन्दन !, हे श्री राम !, मेरे कष्ट को हरने वाले
हे पिता के प्रिय पुत्र ! तुममुझे त्यागकर कहाँ चले गये

 कौसल्ये ! कुछ नहीं सूझता, हे सुमित्रा ! मैं अब जाता
शत्रु रूपिणी क्रूर कैकेयी !, कर विलाप तन त्याग दिया

निकट सुमित्रा, कौसल्या के, अंत हुआ उनके जीवन का
पुत्र शोक से व्याकुल थे वे, अर्ध रात्रि को प्रस्थान किया


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में चौसठवाँ सर्ग पूरा हुआ.