Monday, July 17, 2017

राजा दशरथ का शाप का प्रसंग सुनाकर कौसल्या के समीप रोते-बिलखते हुए आधी रात के समय अपने प्राणों को त्याग देना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

चतुःषष्टितमः सर्गः

राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनिकुमार के वध से दुखी हुए उनके माता-पिता के विलाप और उनके दिए हुए शाप का प्रसंग सुनाकर कौसल्या के समीप रोते-बिलखते हुए आधी रात के समय अपने प्राणों को त्याग देना  

अनजाने में मेरे हाथों, बेटे का वध हुआ आपके
मेरे प्रति शाप या अनुग्रहहो प्रसन्न अब उसको दे दें

अपने मुख से प्रकट किया था, पाप कृत्य महर्षि के आगे
बात क्रूरता पूर्ण सुनी पर, शाप कठोर वे नहीं दे सके

आँखों से आँसूं बह निकले, गहरी श्वासें लीं पीड़ा से
हाथ जोड़ मैं वहाँ खड़ा था, शब्द कहे यही महामुनि ने

यदि यह अपना पापकर्म तुम, स्वयं आकर ही नहीं बताते
शीघ्र तुम्हारे इस मस्तक के, शत-सहस्त्र टुकड़े हो जाते

जानबूझ यदि कोई क्षत्रिय, वध करता वानप्रस्थी का
वज्रधारी इंद्र हो चाहे, निज स्थान से भ्रष्ट हो जाता

तप में लगे हुए मुनिपर, शस्त्र प्रहार यदि कोई करता
मस्तक टुकड़े-टुकड़े होकर, सप्त भाग में बंट जाता

अनजाने में पाप किया है, इसीलिए जीवित हो अब तक
जानबूझ कर यदि करते तोबचता नहीं रघुवंश का कुल 

कहा उन्होंने यह भी मुझसे, उस स्थान पर ले चलो हमें
जहाँ हमारा पुत्र पड़ा है, अंतिम दर्शन उसका कर लें 

दुःख में पड़े थे दम्पत्ति वे, उनको लेकर गया अकेला
जहाँ काल के हो आधीन, सुत पृथ्वी पर अचेत पड़ा था

खून से लथपथ सभी अंग थे, मृगचर्म व वस्त्र बिखरे थे
स्पर्श कराया सुत के तन का, पत्नी सहित मुनि को मैंने

वे दोनों गिर पड़े थे तन पर, कहा पिता ने तब पुत्र से
न तो करते हो प्रणाम आज, ना ही मुझसे बातें करते

धरती पर क्यों सोये हो तुम, क्या तुम हमसे रूठ गये हो
यदि मैं नहीं हूँ प्रिय तुम्हारा, देखो अपनी माता को तो

इसके हृदय से लग न जाते, कुछ तो बोलो पुत्र हमारे
कौन सुनाएगा अब शास्त्र, पिछली रात में मधुर स्वरों से

संध्या, स्नान, अग्निहोत्र कर, कौन करेगा सेवा हमारी
कंद. मूल, फल लाकर हमकोभोजन देगा अतिथि की भांति

अंधी, बूढ़ी, दीन है माता, पुत्र हित उत्कंठित रहती
भरण-पोषण कैसे होगा, तुमको सदा ही चिंता रहती

जाओ नहीं यमराज के घर, तुम कल चलना साथ हमारे
हम दोनों दुःख से व्याकुल, शीघ्र यमलोक की राह लेंगे

सुर्यपुत्र यम का दर्शन कर, मैं उनसे यह बात कहूँगा
अपराधों को क्षमा करें वे, तुम को दे देंगे प्राण पुनः

धर्मात्मा लोकपाल हैं,   दे सकते हैं अभयदान वे
तुम निष्पाप पुत्र हमारे, मारा जिसे एक क्षत्रिय ने

उन लोकों को प्राप्त करो तुम, मेरे सत,तप के प्रभाव से
शूरवीर प्राप्त जो करते हैंमारे जाने पर युद्ध में

नृप सगर, शैव्य, राजा दिलीप, धुन्धुमार, जनमजेय व नहुष
जिस गति को ये प्राप्त हुए हैं, उस गति को पा जाओगे तुम  



Thursday, July 13, 2017

राजा दशरथ का शाप का प्रसंग सुनाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

चतुःषष्टितमः सर्गः

राजा दशरथ का अपने द्वारा मुनिकुमार के वध से दुखी हुए उनके माता-पिता के विलाप और उनके दिए हुए शाप का प्रसंग सुनकर कौसल्या के समीप रोते-बिलखते हुए आधी रात के समय अपने प्राणों को त्याग देना 

उन तपस्वी के अनुचित वध का, कर स्मरण रघुकुल नरेश ने
पुत्र हेतु विलाप करती जो, कौसल्या से ये वचन कहे

अनजाने में पाप हुआ था, हुईं इन्द्रियां व्याकुल मेरी
अब किससे कल्याण हो मेरा, यही चिंतना बुद्धि करती

उठा घड़े को जल लेकर फिर, गया आश्रम को मुनिदेव के
माता-पिता को देखा मैंने, दुर्बल, वृद्ध, अंध जो थे

कोई नहीं सहायक उनका, पंख कटे दो पक्षी जैसे
पुत्र की ही चर्चा करते थे, उसके आने की आस में

उस चर्चा के कारण उनको, नहीं थकावट कोई होती
मेरे कारण अब वह आशा, धूल धुसरित ही हो चुकी थी

भय से नहीं था होश ठिकाने, मन शोक से घबराया था
मुनि के आश्रम पर जब पहुँचा, शोक और भी अधिक हो गया 

शीघ्र ही जल ले आओ, पुत्र !, बोले पैरों की आहट सुन
बड़ी देर तक की है तुमने, जल में क्रीड़ा जिस भी कारण

उस कारण को लेकर ही तो, उत्कंठित हो गयी है माता
यदि हमने कुछ किया अप्रिय, इसको अपने मन में न लाना

हम अंधे, असहाय बूढ़े हैं, तुम्हीं सहायक हो हमारे
आज क्यों नहीं बोल रहे हो, तुममें अटके प्राण हमारे

 समा गया भय मेरे मन में, लड़खड़ाने लगी थी जबान
अस्पष्ट वाणी में बोला, कर नहीं पाता था उच्चारण

कुछ बाहरी चेष्टा करके, मन के डर को कुछ दूर किया
कुछ कहने की हिम्मत बाँधी, मुनि से ऐसा वचन फिर कहा

पुत्र नहीं मैं हूँ आपका, दशरथ नामका एक क्षत्रिय
कर्मवश ऐसा दुःख पायानिंदा जिसकी सत्पुरुषों ने की

धनुष-बाण ले आया था मैं, मृगया खेलूँ सरयू तट पर
सुना शब्द जब जल भरने का, सोचा पीने आया गज जल

बाण चलाकर जब जा देखा, लगा तपस्वी की छाती में
मृतप्राय वह पड़े धरा पर, पीड़ा अति हो रही थी उन्हें

उसी समय उनके कहने से, मर्मस्थान से बाण निकाला
स्वर्ग सिधारे तत्क्षण वे तब, मरते समय अति विलाप किया

  

Thursday, July 6, 2017

राजा दशरथ का शोक और उनका कौसल्या से अपने द्वारा मुनिकुमार के मारे जाने का प्रसंग सुनाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

त्रिषष्टितम: सर्गः

राजा दशरथ का शोक और उनका कौसल्या से अपने द्वारा मुनिकुमार के मारे जाने का प्रसंग सुनाना

करुणा भरे वचन सुनकर ये, मन में अति व्यथा हुई मेरे
कहाँ धर्म की अभिलाषा थी, कहाँ अधर्म किया था मैंने

करुणा भरे वचन सुने ऋषि के, धनुष-बाण तब छूट गये थे
होने लगी विलुप्त चेतना, घबराया मैं शोक वेग से

अंतर में छा गयी दीनता, हृदय अत्यंत हो गया दुखी
सरयू के तट पर जा देखा,पड़े थे घायल एक तपस्वी

बिखरी हुईं जटाएं उनकी, रक्त, धूल में देह सनी थी
 जल घड़े का पतित हुआ था, देह बाण से बिंधी हुई थी

भय से आकुल चित्त हुआ तब, दशा देखकर यह मुनिवर की
मानो भस्म मुझे कर देंगे, डाली मुझपर ऐसी दृष्टि

पूछा तब कठोर वाणी में, क्या अपराध किया था मैंने
माता-पिता के हित आया, जल लेने की ही इच्छा से

एक बाण से मर्म विदीर्ण कर, बूढ़े मा-पिता को मारा
दुर्बल और नेत्रहीन हैं, बैठे हैं ले जल की आशा

लगता फल विहीन ही होता, तप या पूरा शास्त्र ज्ञान भी
पड़ा हूँ मैं मृत्युशैया पर, नहीं जानते पिता हैं यह भी

जान भी लें तो क्या कर सकते, चलने-फिरने में असमर्थ
वृक्ष वृक्ष को बचा न पाएरक्षा में मेरी नहीं समर्थ

तुम्हीं शीघ्र जाकर यह कह दो, तब वे शाप नहीं देंगे
यदि स्वयं ही कह दोगे तो, क्रोध से भस्म नहीं करेंगे

उधर गयी  है यह पगडंडी, जहाँ माँ-पिता का आश्रम है
तुम जाकर शीघ्र प्रसन्न करो, कुपित हुए वे शाप न दे दें

पीर मर्मस्थान को देता, बाण निकालो तन से मेरे
जैसे नदी के जल का वेग, कोमल बालू तट को तोड़े

मुनिकुमार की बात सुनी जब, घिरे चिंता में मेरे प्राण
नहीं निकालूँ पीड़ा देगा, मृत्यु दे अगर निकालूँ  बाण

लक्ष्य किया था इस दुविधा को, मुनिकुमार ने तब राजा की
राजन, पीड़ा अति मैं पाता, मृत्यु निकट आयी है मेरी

नेत्र चढ़े, हर अंग में कष्ट, नहीं चेष्टा कोई होती
कर स्थिर मन को, रोक शोक को, धीरज से कहता हूँ फिर भी

ब्रह्म हत्या मुझसे हो गयी, इस चिंता को तुम दूर करो
 नहीं हूँ ब्राह्मण इसीलिए तुम, न अपने उर में  व्यथा करो

वैश्य पिता व शूद्र माता हैं, इतना ही वह कह पाये थे
बड़े कष्ट का अनुभव करते, पीड़ा से छटपटा रहे थे

मैंने बाण निकाला तन से, भयभीत हो देखा मुझको
प्राण त्याग दिए थे तत्क्षण, देख उन्हें हुई पीड़ा मन को 


इस प्रकार श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में तिरसठवाँ सर्ग पूरा हुआ.

Monday, July 3, 2017

राजा दशरथ का कौसल्या से अपने द्वारा मुनिकुमार के मारे जाने का प्रसंग सुनाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्


त्रिषष्टितम: सर्गः

राजा दशरथ का शोक और उनका कौसल्या से अपने द्वारा मुनिकुमार के मारे जाने का प्रसंग सुनाना

दिनकर धरा के रस सुखाकर, कर संतप्त ग्रीष्म किरणों से
प्रेत जहाँ उस यमवर्ती, दक्षिण दिशा में संचरण करते

कामभावना बढ़ाने वाली, मतवाली वर्षा ऋतु आई
सजल मेघ सब ओर छा गये, गर्मी जल्दी शांत हो गयी

पाँखें भीग गयीं नभचर की, कठिनाई से वहाँ पहुँचते
जहाँ वृक्ष की शाखाओं के, अग्रभाग अति झूम रहे थे

गिरे हुए व झर-झर गिरते, जल से आच्छादित हो हाथी
लगता सागर हो प्रशांत या, भीगा हुआ सा पर्वत कोई

निर्मल होने पर भी झरने, आ धातुओं के सम्पर्क में
श्वेत, लाल, भस्मयुक्त हो, रगीं सर्पों की भांति बहते थे

वर्षा की सुहानी ऋतु में, ले धनुष बाण हो रथ पर सवार
सरयू के तट पर जा पहुँचा, मैं मतवाला खेलूँ शिकार

थीं नहीं इन्द्रियां निज वश में, सोचा यह, तब मारूँगा मैं 
 भैसा, हाथी, सिंह, या व्याघ्र, आवेंगे जब पानी पीने

अंधकार सब ओर छाया था, पानी की दी ध्वनि सुनाई
हाथी ज्यों पानी पीता हो, ऐसी ही वह जान पड़ी थी

दृष्टि नहीं देख पाती थी, किंतु सोचा यह हाथी होगा
तरकस से  इक तीर निकाला, शब्द लक्ष्य कर उसे चलाया

विषधर सर्प समान विषैला, जैसे ही बाण वह छोड़ा
पानी में गिरते प्राणी का, हाहाकार शब्द सुना था

उषाकाल की बेला थी वह, मानव वाणी पड़ी सुनाई
मुझ तापस को किसने मारा, लेने आया था मैं पानी

क़िसका क्या बिगाड़ा मैंने, नहीं किसी को पीड़ा देता
वल्कल धारी तापस हूँ मैं, किसको इस वध से लाभ हुआ

क्या अपराध किया था मैंने, व्यर्थ ही जो यह कृत्य किया
नहीं किंचित भी होगा लाभ, केवल अनर्थ ही प्राप्त किया

कोई नहीं भला समझेगा, इस हत्यारे को इस जग में
माँ-पिता लिए हूँ चिंतित, स्वयं की पीड़ा नहीं है मुझको

 कौन करेगा पालन-पोषण, कैसे वे निर्वाह करेंगे
 तीनों का ही वध कर डाला, हत्यारे ने एक बाण से


Friday, June 16, 2017

राजा दशरथ का शोक और उनका कौसल्या से अपने द्वारा मुनिकुमार के मारे जाने का प्रसंग सुनाना

श्रीसीतारामचंद्राभ्यां नमः
श्रीमद्वाल्मीकीयरामायणम्
अयोध्याकाण्डम्

त्रिषष्टितम: सर्गः

राजा दशरथ का शोक और उनका कौसल्या से अपने द्वारा मुनिकुमार के मारे जाने का प्रसंग सुनाना

दो ही घड़ी सोये थे राजा, व्याकुलता से जाग पड़े
वन में जाने से राम के, मन ही मन चिंता करते थे

इन्द्र्तुल्य तेजस्वी नृप को, शोक ने ऐसे आ दबाया
अंधकार राहु का जैसे, छाकर दिनकर को ढक लेता

पत्नी सँग वन गये राम जब, कोसल नरेश को स्मरण हुआ
कजरारे नेत्र जिसके, कहूँ, कौसल्या को पाप पुराना 

वनवास गये छठी रात्रि थी, आधीरात उन्हें हुआ स्मरण
कौसल्या को लगे बताने, पूर्व काल में किया दुष्कर्म

शुभ-अशुभ नर जो भी करता, सुख-दुःख उनसे ही पाता है
कल्याणी ! हे भद्रे !, कर्म ही, हर्ष व शोक प्रदाता है

 आरम्भ  में जो कर्मों की, लघुता, गुरुता नहीं देखता
लाभ-हानि या गुण-दोष ही, वह बालक ही समझा जाता 

सुंदर पुष्प पलाश का देख, मन ही मन यदि सोचे कोई
 सुस्वादु और मनोहर होगा, इस वृक्ष का फल अवश्य ही

आम्र वाटिका काट यदि वह, पौध पलाश की लगाके सींचे
पश्चाताप अति उसे होगा, फल पाकर न अनुरूप आशा के

फल का ज्ञान नहीं रखता जो, केवल कर्म किये जाता है
आम काट पलाश बोने सा, शोक उसे फल पा होता है

आम्र वाटिका काट यदि वह, पौध पलाश लगाके सींचे
पश्चाताप अति उसे होगा, फल पा न अनुरूप आशा के

फल का ज्ञान नहीं रखता जो, केवल कर्म किये जाता है
आम काट पलाश बोने सा, शोक उसे फल पा होता है

काट आम के वन मैंने, सींचे पलाश यही मानता
बुद्धि अति खोटी है मेरी, फल पाकर अत्यधिक पछताता

पिता के जीवन काल में जब, ख्याति मेरी फ़ैल गयी थी
राजकुमार धनुर्धर था, बाण चलाता था शब्द वेधी

इसी ख्याति में पड़कर मैंने, एक पाप कृत्य कर डाला
इस महान पीड़ा के रूप में, उसी कुकर्म का फल पाया  

 यदि अज्ञान वश विष खाले, बालक को वही मार डालता
मोह, अज्ञान से किया कर्म, उसका फल ही पड़ा भोगना

जैसे कोई गंवार मनुष्य, हो मोहित केवल फूल पर 
वैसे ही मैं सुन प्रशंसा, मोहित हुआ था इस विद्या पर

इससे पापकर्म बन सकता, यह ज्ञान मुझे नहीं हुआ था
देवी, जब युवराज ही था मैं, अभी विवाह नहीं हुआ था